कश्मीर में भा ज पा सरकार डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को सच्ची श्रद्धान्जली ------------ 1953 में जनसंघ का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन कानपुर में हुआ. इसी अधिवेशन में डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देश को जम्मू-कश्मीर के बारे में यह तेजस्वी नारा दिया- " एक देश में दो विधान , दो प्रधान , दो निशान- नहीं चलेंगे नहीं चलेंगे ". यह डा.श्यामा प्रसाद मुकर्जी का ही निर्णय था कि वे पूरे भारत में घूम घूम कर जनसाधारण को वे इस नारे कि गंभीरता से परिचित करवाएंगे. और उनका यह निर्णय सही साबित भी हुआ. पूरे देश से उन्हें अभूतपूर्व समर्थन प्राप्त हो रहा था. इसी समर्थन से राज्य सरकार एवं उस समय कि केंद्र सरकार बिलकुल घबरा गयी थी.
इसी लिए बड़ी कुटिलता से पंजाब सरकार नें उन्हें पंजाब के माधोपुर में रावी नदी के पुल पर जाने दिया गया. ज्ञात रहे यही से पंजाब से जम्मू कश्मीर में दाखिल हुआ जाता था और जिस व्यक्ति के पास जम्मू कश्मीर में दाखिल होने का परमिट न हो उसे वाही रोक दिया जाता था . लेकिन कुटिलता वश उन्हें वहा नहीं रोक गया. उन्हें पुल पर जाने दिया गया. लेकिन पुल के बीचो बीच जम्मू कश्मीर पुलिस के एक दस्ते ने उन्हें रोक लिया और बंदी बना लिया. तत्पश्चात जैसा कि सर्वविदित है कि डा.श्यामा प्रसाद मुकर्जी की कश्मीर की एक जेल में रहस्यमयी परिस्तिथियों में म्रत्यु हो गयी . स्पष्ट है कि केन्द्रीय सरकर और जम्मू कश्मीर सरकार की यह संयुक्त योजना थी कि श्री मुकर्जी को जम्मू कश्मीर सरकार का बंदी बनाया जाए , पंजाब सरकार का नहीं. ऐसा क्यों किया गया ? क्या दोनों सरकारे प्रजा परिषद् के आन्दोलन एवं डा.श्यामा प्रसाद मुकर्जी को मिल रहे व्यापक जनसमर्थन से डरी हुई थी ? क्या इसमें कोई साजिश थी , जिसका उद्देश्य श्री मुकर्जी कि हत्या करना था ? आज तक इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं मिल सका. किन्तु जवाहर लाल नेहरु और शेख अब्दुल्लाह की वजह से भारत ने एक महान सपूत खो दिया।
डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की शहादत व्यर्थ नहीं गयी. जन-जन में आक्रोश पैदा हुआ. प् जवाहर लाल नेहरु और जम्मू कश्मीर सरकार पर दबाव बना. परिणामस्वरूप कुछ ऐसे परिवर्तन हुए जो भारतवर्ष के लिए सुखद रहे. जम्मू कश्मीर से परमिट सिस्टम बंद कर दिया गया. राज्य में तिरंगा लहराया जाने लगा. उच्चतम न्यययालय , चुनाव आयोग और महालेखागार के अधिकार क्षेत्र विस्तार जम्मू कश्मीर तक कर दिया गया. और ऐसे अनेक परिवर्तन हुए जो राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुदृढ़ करने में सहायक बने. जून महीने के 23 तारीख को डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का बलिदान दिवस मनाया जाता है. उन्ही की याद में पंजाब सरकार ने रावी तट पर डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की भव्य प्रतिमा प्रतिस्थापित की है. यह प्रतिमा डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की शहादत के साथ आजाद भारत के प्रथम राष्ट्रीय आन्दोलन " प्रजा परिषद् आन्दोलन " की भी याद दिलाती है.
आज के दिन जम्मू कश्मीर में भा ज पा की सरकार बनने जा रही है -जो स्वप्न डॉ साहब ने देखा था आज उस दिशा में एक कदम आगे बढ़ा है आज भले ही वो हमारे बीच न हो किन्तु उनका बलिदान ब्यर्थ नहीं गया ,आज ऐसे महान पुरुष को सच्ची श्रद्धान्जली अर्पित करना हमारा नैतिक दायित्व है .

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