भारतीय संस्कृति के स्वर यह प्रमाणित करने के लिये पर्याप्त हैं कि वैदिक संस्कृति निरन्तर आगे बढ़ते रहने को अपना लक्ष्य मानती आयी है और उसके लिये जिस अनुसन्धान की आवश्यकता है, वह दृष्टि उसके पास है। प्रस्तुत निबन्ध के माध्यम से यह प्रतिपादित करने का प्रयास किया जा रहा है कि मनुष्य के जीवन के लिये प्रथम आवश्यकता नियमित भोजन की उपलब्धता रही है। वेद और वैदिक साहित्य में इस दिशा में बढ़ते हुए मानव के पदचाप को स्पष्ट रूप से सुना जा सकता है।
वेद का ऋषि कृषि का गुणगान करता हुआ कहता है-
अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्कृषस्व वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः।
तत्र गावः कितव तत्र जाया तन्मे वि चष्टे सवितायमर्यः
द्यूत की निन्दा करता हुआ ऋषि कहता है कि मुझे सविता देव ने कहा है जुआ मत खेल, कृषि ही कर, उससे प्राप्त आय को ही बहुत मान। इस कृषिकर्म से गायों अर्थात् समृद्धि की प्राप्ति होती है, और उससे पत्नी की प्राप्ति भी होती है। इस प्रकार मनुष्य जिस सुखमय विविधतापूर्ण संसार की कल्पना कर सकता है, उस सबकी उपलब्धि कृषि से होती है। अतः भारतीय संस्कृति में कृषि एक विशेष स्थान रखती है।
कृषि के प्रकारों का उल्लेख करते हुए गृह्यसूत्रों में कहा गया है-‘कृषिः सहस्रप्रकारा’ कि कृषि सहस्रों प्रकार की होती है ,एक अन्य स्थान पर कहा गया है-‘कृषिर्हिरण्यप्रकारा’,कि कृषि हिरण्य प्रकार की होती है। इस सबके कथन का यह अभिप्राय प्रतीत होता है कि कृषि करने की केवल एक विधि नहीं है और साथ ही इससे प्रचुर धनधान्य की उपलब्धि होती है।
ऋग्वेद का ऋषि कृषि के महत्त्व का प्रतिपादन करता हुआ कहता है-
कृषन्नित्फाल आशितं कृणोति यन्नध्वानमप वृङ्क्ते चरित्रैः।
वदन् ब्रह्मावदतो वनीयान् पृणन्नापिरपृणन्तमभि ष्यात्।।जो कृषक हल चलाता है, वह अन्न का भोग करता है और जो ऐसा नहीं करता, वह भूखा रहता है। जो चलता है, वही मार्ग को पार करता है अर्थात् जो चलने का प्रयास नहीं करता, वह वहीं का वहीं रह जाता है। प्रवचन करने वाला प्रवचन न करने वाला से श्रेष्ठ है, इसी प्रकार अन्न से दूसरों को तृप्त करने वाला ऐसा न करने वाले से श्रेष्ठ है।
उपर्युक्त मन्त्र में अनेक उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया गया है कि न करने वाले से करने वाला श्रेष्ठ है। यहाँ कृषिकर्म करने के लिये जिस साधन की अपेक्षा की गयी है, वह फाल अर्थात् हल है। पुरातन काल से लेकर आज के वैज्ञानिक युग में भी कृषि का अन्यतम साधन हल ही है। इसके विना न प्राचीनकाल में कृषि कर्म सम्भव था और न आज है। इसलिये अथर्ववेद में कहा गया है- कृष्टे फालेन रोहति;-कि फाल से कृषि कर्म करने पर खेती बढ़ती है। यजुर्वेद में फाल के विषय में कहा गया है- शुना॑सीरा ह॒विषा॒ तोश॑माना सुपिप्प॒लाऽओष॑धीः कर्त्तना॒स्मे।।कीनाश अर्थात् परिश्रम से खेती करने वाले कृषक ,वाह अर्थात् बैलों से फाल के द्वारा भूमि को विस्तीर्ण करते अर्थात् खोदते हैं।हवि से शुद्ध किये गये वायु और र्स्यू हमारे लिये सुन्दर फलों से युक्त ओषधियों को प्रदान करें।
उपर्युक्त मन्त्र में कृषि के साधन के रूप में हल के साथ-साथ बैलों का भी उल्लेख किया गया है। इनको यहाँ वाह नाम से अभिहित किया गया है। क्योंकि हल को वहन करने के कारण ये वाह कहे गये हैं।इससे यह विदित होता है कि बैल से कृषि की जाने की परम्परा अति प्राचीन है। इसके अतिरिक्त कृषि के संसाधन के रूप में वेद का ऋषि वायु और सूर्य का भी वर्णन करता है, साथ ही यह भी कहता है कि ये हवि से पवित्र होने चाहिये। इससे यह निष्कर्ष ग्रहण किया जा सकता है कि वेद कृषि के लिये दूषित वातावरण को उपयुक्त नहीं मानता। जिस प्रकार आज हम लोग अपने खाने-पीने की वस्तुओं में शुद्धता की अपेक्षा रखते हैं, उसी प्रकार की शुद्धता अन्न के उत्पादन में भी होनी चाहिये। यदि निष्पक्ष रूप से विचार किया जाए तो कहा जा सकता है कि भोजन के पकाने और खाने की समय की शुद्धता से उत्पादन के समय की शुद्धता अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसीलिये महर्षि दयानन्द कहते हैं कि खेत में विष्ठा आदि मल नहीं डालना चाहिये। किन्तु बीज आदि सुगन्धि आदि से सुगन्धित करके बीज बोने चाहिये, जिससे अन्न आरोग्यकारक हों और बल और बुद्धि की वृद्धि हो। महर्षि का यह कथन आज के युग में अधिक प्रासङ्गिक होगया है।
कृषि प्रकरण में बैल, फाल आदि का वर्णन मिलता है, वहीं सीता शब्द का प्रयोग भी हुआ है। यजुर्वेद में सीता के विषय में कहा गया है-
घृ_तेन॒ सीता॒ मधु॑ना॒ सम॑ज्यतां॒ विश्वै॑र्दे॒वैरनु॑मता म॒रुद्भि॑ः।
ऊर्ज॑स्वती॒ पय॑सा॒ पिन्व॑माना॒स्मान्त्सी॑ते॒ पय॑सा॒भ्या व॑वृत्स्व।।समस्त देवों और मरुतों से अनुमति प्राप्त करके सीता अर्थात् पटेला को घृत और मधु से सिक्त करो। यह पटेला हमको पयस् अर्थात् घृत, जल आदि की प्राप्त कराये।
उपर्युक्त मन्त्र में सीता का वर्णन किया गया है। जब कृषक हल से खेत को जोत लेता है, तब उसे समतल करने के लिये उसमें बैल के पीछे बाँधकर पटेला चलाया जाता है। यह पटेला भूमि के लोष्ठपिण्डों को पीस देता है, इससे भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है। उक्त सीता नामक उपकरण को वेद मधु और घृत से सिक्त करने के लिये कहता है। इससे यह आशय प्रतीत होता है कि जिस खेत में हल चलाया जाए, वह एकदम शुष्क नहीं होना चाहिये, उसमें आर्द्रता को बतलाने के लिये वेद ने मधु और घृत से सिक्त करने का निर्देश दिया है, जो कि सर्वथा समीचीन है।
ऋग्वेद के एक अन्य मन्त्र में सीता के विषय में कहा गया है-
अ॒र्वाची॑ सुभगे भव॒ सीते॒ वन्दा॑महे त्वा।
यथा॑ नः सु_भगास॑सि॒ यथा॑ नः सु_फलास॑सि।।यह नीचे मुख करके चलने वाली सीता(लोह या काष्ठ का फलक) तू सौभाग्य से युक्त हो, इसलिये हम तुम्हारी कामना करते हैं, जैसे तुम सौभाग्य देने वाली हो, वैसे ही सुन्दर फल देने वाली भी होओ।
यहाँ सीता के स्थान और कार्य का वर्णन किया गया है। सीता को नीचे मुख करके कार्य करने वाली बताया गया है। भूमि को समतल करने के लिये सीता का जो भाग पृथिवी के सम्पर्क में आता है, उसे उसके मुख के रूप में चित्रित किया गया है।
कृषि में प्रयुक्त होने वाले कतिपय अन्य उपकरणों का वर्णन करता हुआ यजुर्वेद कहता है- फाल से युक्त, टेड़ा चलने वाला, सुखकारक लाङ्गल अर्थात् जो हल के फाल के नीचे लगाया जाने वाला काष्ठ है, वह चलाने योग्य हो, जिसे बैल सरलता से लेकर चल सकें, ऐसा रथ के चलने का साधन मोटी मिट्टी को उखाड़ने वाला होता है।
उक्त मन्त्र में हल के फाल के नीचे लगने वाले काष्ठ और उसकी उपयोगिता को बताया गया है। जहाँ पृथिवी की परत बहुत मोटी होती है, वहाँ हल के फाल के नीचे काष्ठ को लगाया जाता है और हल कुछ तिरछा करके चलाते हैं, तभी मिट्टी मोटी परत उखड़ पाती है।
यजुर्वेद में हल और उसके अन्य उपकरणों का वर्णन करता हुआ ऋषि कहता है-
सीरा॑ युञ्जन्ति क॒वयो॑ यु_गा वित॑न्वते॒ पृथ॑क्। धीरा॑ दे॒वेषु॑ सुम्न॒या।।जैसे कवि अर्थात् बुद्धिमान् जन ध्यान के माध्यम से सुख को प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार कृषिकर्म में हलों और जुए को युक्त किया जाता है।
उक्त मन्त्र में हल के स्वरूप को पूर्णता देते हुए उसे जुए को साथ जोड़ा गया है। जुए के माध्यम से बैल हल को खींच पाते हैं।
यु_नक्त॒ सीरा॒ वि यु॒गा त॑नुध्वं कृ॒ते योनौ॑ वपते॒ह बीज॑म्।
गि॒रा च॑ श्रु_ष्टिः सभ॑रा॒ अस॑न्नो॒ नेदी॑य॒ऽइत्सृ_ण्य०ः प॒क्वमेया॑त्।।हल को बैलों के साथ जोड़ने के लिये युग(जुए) को फैलाओ। खेत को जोतकर उसमें बीज बोओ, जिससे खेत शीघ्र सस्य से हरा-भरा हुआ हो जाये और पका हुआ अन्न सृणि अर्थात् अङ्कुश के समान वक्र लवित्र से काटे जाने पर हमारे घर आये।
उक्त मन्त्र में खेती के स्वरूप को पूर्णतया स्पष्ट कर दिया गया है, खेती के उपकरण लाङ्गल(हल के आकार का काष्ठ), फाल, बैल इन सबको युग(जुए) के माध्यम से जोड़ा जाता है, जब ये जुड़ जाते हैं, तब खेत में बीज का वपन किया जाता है। सस्य का रूप धारण कर जब फसल पक जाती है, तब कृषक सृणि से काटकर अपने घर ले आता था।
अग्रिम मन्त्र में सस्य को दात्र से काटने का उल्लेख भी देखने को मिलता है-
तवेदिन्द्राहमाशसा हस्ते दात्रं चना ददे।
दिनस्य वा मघवन्सम्भृतस्य वा पूर्धि यवस्य काशिना।। हे इन्द्र! तुमसे आशा लगाये हुए मैं अपने हाथ में दात्र को ग्रहण करता हूँ। दिन की समाप्ति से पहले के ढेर से मेरी मुष्टि को भर दो। उक्त मन्त्र से यह विदित होता है कि फसल को काटने के लिये दात्र अर्थात् दराँती का प्रयोग होता था। दात्र और सृणि दोनों लूनवाचक उपकरण हैं, सम्भवतः इन उपकरणों में कुछ भिन्नता रह हो।
अग्रिम मन्त्र में यह प्रतिपादित किया गया है कि कृषक क्षेत्र की उपज को काटकर घर लाते थे-
कुविदङ्ग यवमन्तो यवं चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय।
इहेहैषां कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नमोवृक्तिं न जग्मुः।। यवादिधान्य से युक्त कृषक यवादि अन्नों को जो-जो अन्न पहले पक गया है, उस क्रम से काटकर सब यजमानों के लिये भोग के साधनों को करें, जिससे यजमान निरन्तर हवियों से यजन करते रहें।
अभीदमेकमेको अस्मि निष्षाळभी द्वा किमु त्रयः करन्ति।
खले न पर्षान् प्रति हन्मि भूरि किं मा निन्दन्ति शत्रवोऽनिन्द्राः।। मैं एक या अनेक शत्रुओं को एकाकी पराजित करता हूँ, जैसे कृषक पुराने व्रीह्यादि के स्तम्बों के ढेर को बड़ी सरलता से तोड़ डालते हैं, ठीक उसी प्रकार मैं शत्रुओं के समूह को तक्षण मार सकता हूँ।
उक्त मन्त्र में उपज के संघात को पर्ष नाम से अभिहित किया गया है। इससे यह विदित होता है कि कृषक गट्ठर बाँधकर लाते थे, फिर उनको किसी सुरक्षित स्थान में रख देते थे। जीर्ण हो जाने पर धान्य के स्तम्ब सरलता से अनाज से पृथक् हो जाते थे।
ऋग्वेद के एक अन्य मन्त्र में कृषि और उसके उपकरणों का वर्णन देखने को मिलता है-
शु_नं वा॒हाः शु_नं नर॑ः शु_नं कृ॑षतु_ लाङ्ग॑लम्।
शु_नं व॑र॒त्रा ब॑ध्य॒न्तां शु_नमष्ट्रा॒मुदि॑ङ्गय।।खेती करने वाले बैल आदि सुख को प्राप्त हों, कृषक सुख को प्राप्त हों, हल का अवयव सुख पूर्वक भूमि को जोते, हल खींचने वाले पशुओं को रस्सी सुख पूर्वक बाँधी जाये, चाबुक या कौड़ा बैल आदि पर सुखपूर्वक चलाये जाये।
उक्त मन्त्र में कृषि उपकरणों के रूप में वाहक(बैल आदि), कृषक, लाङ्गल, रस्सी, अंकुश का उल्लेख किया गया है। उक्त मन्त्र के आधार पर कहा जा सकता है कि हल को वहन करने वाले पशुओं को रस्सी से बाँधा जाता था तथा हाँकने के लिये अंकुश का उपयोग भी होता था, परन्तु इस उपयोग के पीछे पशुओं को प्रताड़ित करने की भावना सर्वथा नहीं थी, इसलिये निर्देश दिया गया है कि प्रतोद का उपयोग सुखपूर्वक किया जाए।
कृषि के सम्बन्ध में मानव संसाधन का उल्लेख करते हुए कहा गया है- खेत के स्वामी और भृत्य आप दोनों पूर्व मन्त्र में जो कहा गया है, उसको पालन करो।’ उक्त मन्त्र के आधार पर कहा जा सकता है कि पशुओं के साथ-साथ कृषि में मानव श्रम का उपयोग भी होता था। कृषक के साथ-साथ भृत्य भी इस कार्य में सहयोग करते थे।
सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत।
अत्रा सखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधि वाचि।। उक्त मन्त्र में विद्वान् व्यक्ति की वाणी की तुलना तितउ(छलनी) से छाने गये सत्तु से की गयी है। इससे यह विदित होता है कि कृषि और उससे प्राप्त अन्न को संसाधित करने के लिये छलनी का प्रयोग होता था।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि वैदिक कालीन कृषि पूर्ण विकसित अवस्था में दिखायी देती है, जो संसाधन, विशेष से उपकरण, कृषि के लिये अपेक्षित रहे हैं, उन सबका वर्णन वैदिक साहित्य में पर्याप्त रूप से उपलब्ध होता है। कृषि के क्षेत्र में प्रयुक्त होने वाले कतिपय शब्द आज भी लोकभाषा में ज्यों के त्यों उपलब्ध होते हैं, जैसे फाल, दात्र, सीर आदि। पंजाब क्षेत्र में आज भी खेत में काम करने वाले को सीरी नाम से अभिहित किया जाता है। कृषि के साथ शुनम् शब्द का व्यापक रूप से प्रयोग देखने को मिलता है, इससे यह निष्कर्ष ग्रहण किया जा सकता है कि चाहे भृत्य हो, या फिर हल का वाहक पशु सबके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता था, जिसमें किञ्चिन्मात्र भी निष्ठुरता नहीं थी। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वैदिक विज्ञान और उससे जन्म लेने वाली प्रौद्योगिकी सर्वजनाय सुखाय और सर्वजनाय हिताय थी, इसलिये उसमें कहीं भी किसी को भी आहत करने का भाव दृष्टिगत नहीं होता।
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